गुरुवार, 11 नवंबर 2010

बदरा पे धूप

*
देसवा की धरती पे पक रहे अमवा
गूंज रही कोयल की कूक ,
बदरा पे धूप सजे मनवा माँ हूक उठे ,
बिरही जियरवा टूक टूक!
*
खेत धन-लछमी ,अँगनवा में गोरिया ,
बाली उमरिया तहू पे लड़कौरिया .
चुरियन की खनक संग अंग में उछाह
दुई हाथन पछोरे भरि सूप !
*
अबकि बार सारो निपाट देई करजा ,
सहर लै जाइ के घुमाइ लाई ओहिका ,
नैनन में चाव भरे सपन सजाय
दमक-दमक नई चूनर में रूप
*
पी-पी पपीहरा गुँजाइ रह बनवा ,
जागत हिलोर उमगात मोर मनवा ,
ढमक ढोल बाजे ,मंजीर खनखनावे,
बजे चंग नेह-रंग रहे डूब !
*

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

विवाह गीत - बन्ना

*
ठाड़े रहियो बनरा ओही गली के किनारे पे
गौरा पूजन हम चौरे पे जइबे ,भौजी के सखियन के साथ ,
पूजन की थारी के रोली अखत धर, तोही का मँगिबे जनम सात,
मिसरी-मखाने परसाद धरि जइबे ,
ठाड़े रहियो ओहि मठिया के पिछाड़े पे
*
माँगन सुहाग भरभुजिन के जइबे ,सखियन के गीत की बहार
अमर सिंदूर का असीस लेइ आइबे तौन होई मंगलचार
नीम तरे चौतरा पे नेक बिलमइबे ,
ठाड़े रहियो बनरा, वा पान-फूल वारे के
*
कुंकुमपत्री धरि के गनेश पहिल पुजिबे,कोई विघन ना होय
बारी कुँआरी ले सातों ही फेरे ,अचल सुहागिन होय
आँचल असीस भरे ओ ही गैल जाऊँगी
अकेल ठाड़े रहियो बनरा, बाहर के ओसारे पे
*
दूब-तेल पूजिवे ,हलदी की छींट डारि ,जइबे माँ के दुआर
उनके परस रूप चढ़े सवायो ,पूरे मन- कामना हमार
कनिया अरघ-जल सींच रही मारग, माथे सुहागिनी की छाँय
देखे रहियो ऊपर के छज्जा के मुँड़ारे से.
ठाड़े रहियो ...
*

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

बटोहिया -

*
राह तीर पनघट पे गागर को धोय माँज,
सीस साधि इँडुरी ,जल धारि पनिहारिया
पंथी से पूछि रही कौन गाम तेरो ,
तोर नाम-काम कौन, कहाँ जात रे बटोहिया.
*
जनम से चलो जात ,मरण की जातरा पे,
मारग मैं धूप-छाँह आवत-है जात है !
कोई छाँह भरो थान देखि बिलम लेत कुछू ,
कोई थान ,घाम गात ताप अकुलात है !
बेबस चलो जात कोऊ रोके को दिखात नाहीं
मारग पे जात लोग साथ रे बटोहिया !
*
जाने कहां ते ई धरती पे आय पड़्यो
जाने कइस ,जाने कहाँ ,जाने काहे जानो नाहिं
कोऊ नाहीं हुतो, कोऊ जान ना पिछान
खाली हाथ रहे दूनौ आप हू को पहचानो नाहिं
मारो-मारो फिरत हूँ दुनियां की भीर
चलो जात हूँ अकेलो,  कहात हूँ बटोहिया !
*
साथ लग जात लोग ,और छूट जात हैं
नाम मोय नायं पतो ,लोग धर दीनो है
जातरा में पतो कौन आपुनो परायो कौन
सुबेसे चलो हूँ संझा तक गैल कीन्हों है ,
पूछति है बार-बार कौतुक से भरी नार
पथ को अहार ,कहा लायो रे बटोहिया ,
*
माथे धरी पोटली में धर्यो करम को अचार ,
रोटी तो पोय के इहाँ ही मोहे खानी है ।
मोह-नेह भरे चार बोल तू जो बोल रही
ताप और पियास हरि जात ऐसो पानी है
आगे को रँधान हेत करम समेट मीत,
बाँध साथ गठरी में गाँठ दै बटोहिया !
*
राह अनबूझी सारे लोग अनजाने इहाँ ,
आय के अकेलो सो परानी भरमात है
वा की रची जगती के रंग देखि देखि मन
ऐसो चकियायो अरु दंग रहि जात है !
भूलि गयो भान काहे भेजो हैं इहाँ पे ठेल
ओटन को लाय के कपास रे बटोहिया
*
उहै ठौर जाए पे पूछिंगे कौन काम कियो ,
सारो जनम काटि कहो लाए का कमाय के
घड़ा जल पूर सिर , पनिहारी हँसै लागि,
बात को जवाब कइस देहुगे बनाय के .
धोय-माँज मन की गगरिया में नेह पूरि
पल-पल सुधि राख जिन पठायो रे बटोहिया
*

बुधवार, 1 सितंबर 2010

श्री कृष्ण-जन्माष्टमी पर - कृष्ण का न्याय.

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गोरस की हाँडी कबहुँ बोरसी पे चढी नायँ ,तीज-त्यौहार हू कढ़ाही रही छूछ ही,
एकै बार पेट तो भराय दिन भरै माँझ रात पेट बाँधि काट लेव चुपैचाप ही ,
कइस दिन बिताय रहे जाके जगदीस मीत.साँच हैकि झूठ ही बनाय के सुनायो है ,
मीत हैं तो मिलबें की चाह नाहिं दीखी कबहुँ कैसो कठोर है करेजो जौन पायो है
*
कौन भाँ ति सामनो करौंगो हौं दरिद्र -दीन बे तो द्वारका के नाथ सबै विधि लायक हैं
खाली हाथ को हिलात जाय ठाड़ होऊँ,इहाँ भेंट को कुछू न पास कोऊ न सहायक है
बाम्हनी ने चार मुठी चिवरा उधार माँगि ,कपरा की पुटरी में दीन्ह गाँठ बाँधि के
देखियो सँभारिहौ ई बिखरि न जाय कहूँ कपरा पुरान, तौन राखि लीजो साधि के
*
तुम्हरे गुरु-भाई बे द्वारका के धीस /ब्योहार इहैं उहाँ कुछू उहाँ भेंटिबे को चाहिजे ,
आगे को हाल जानि ह्वैहैं सहाय ,पिया आज तो उहाँ की गैल तुरतै ही जाइए .
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भुज भरि भेंटे लाइ पाट पे बिठायो ,नीर नैन भरि आयो देखि दीन दसा मीत की ,
पहिले ही आय, के उरिन होत एते दिन काहे को लगाय बलिहारी परतीत की
लाजन के मारे कांख दाबे दुरावत हैं ,भेंट नहीं पावत हैं भुज भरि नेह सों,
खींचि लियो हाथ थाम लीन्हीं पुटरिया, ई घट-घटकी जाने बात, इनसों छिपात को
*
वह रे सुदामा कइसी नियत तुम्हार, जासों नियति तुम्हार आज ई दिन दिखायो हैं.
उहै भूखवारी मेरो भाग खाए की कसर चुकायबे को लै के पुटरिया आज मोर मीत आयो है
काहे न देत जौन भेंट है हमार ,इहै चाउर के कारनै हम राह देखिबे करी,
अब तुम निपाट दीन व्याज और मूल विधना हू ने तुम्हार ,सबै भर पाई करी ,
*
दियो गुरु माई, सारो चबेना सपोटि गए, भौजी के चिऊरा हू देत नहीं लालची ,
पहले उधारवारो करजा चुकाइ देहु ,पाछे मोर-तोर बात प्रीत-व्योहार की .
अन्न-धन-धाम जौन अटके परे है इहै बाधा रही एक आजु पार करो भाव सों
खींचि लई चिऊरन की पोट लै उछाह भरे भरि-भरि मूठी ,बे चबाइ रहे चाव सों ,
*
सकिलि आईँ रुकमिनी ,अकेल ना तुम्हार सबै, हम हू ना छोड़ी जौन है हमार भाग के
छीनि लई ,थोर-थोर रानिन ने बाँट लई ,हमारो जो अहै अब राखौंगी साधि के
हाय गजब ,एक-एक मूठी पे एक लोक वारत हैं बाम्हन पे मीचि आँखि आपुनी,
अइसे लीन भए और सबै बिसराय दियो हम जो इसारे समुझात रहे ना सुनी .
*
मान-पान ,भयो सबै भाँति सतकार पाइ बिदा भे सुदामा ,आय ठाड़ भए द्वार पे ,
अब ना लगायो देर दुख ना उठायो मीत , अंतर की बात मोंसों बाँटि लियो आय के .
समुझै न विप्र कुछू चकियायो देखि रह्यो ,मोहन की लीला ,को पार कहाँ पाइये ,
बिदा भे सुदामा पछतात जात मारग में काहे मेहरारू की बातन में आइगे !
*

पथ की थकान ई पुरानो पदत्रान, चलतई में घिसानो मार चुभो जात पायँ में
चिउरा उधार के चुकाइबे परेंगे ,और हाल ई मिलाप के ऊ पूछिंगे गाँव में !
बावली है बाम्हनी ,इहाँ की गैल ठेलि के लगाइ आस बैठी जिमि भाग फिरि जाइंगे
लागी जा की आस रही, कुछू मिलो नायँ घरनी की बात मानि जाने काहे इहाँ आय गे ,.
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जातइ ,करारी डाँट ओहिका लगावत हौं ,राज-पाट लायो हूं सो रखि ले सम्हालि के
थोरो सो आपुनो उठाय सिर जीवत जो ,सारो लै डारो द्वारका की गैल डारि के .
करत बिचार देखि रहे नए साज-बाज ,कतहूँ ना दिखात रहे जीरन अवास जो
हाय-हाय भूलि पंथ , फिरै उहाँ आय गयो ,अब तो चार चाउर ही भेंट नहीं पास हो,
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विप्र पछिताय रह्यो ,कहूँ निस्तार नाहिं,कान भरमात जइस टेरति है बाम्हनी
अपुन छिपाय मुँह दुआरे से लौटि चले ताही पल दुपट्टा गहि खींचि लियो भामिनी .
सारी की चींट फारि चोट आँगुरी पे बांधी , द्रौपदी को रिन उन चुकायो केहि भाँति सों ,
ब्याज सहित मूल, जो चबेना को वसूल करि आपुनो ही भाग ,राज बाँटि दियो चाव सों!
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मंगलवार, 24 अगस्त 2010

भारत माने इंडिया

*(यह प्रवासी बच्चों की ओर से )
हमको भारत क्यों भाता है ,(भारत माने इंडिया )
हमें इंडिया क्यों भाता है !
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दादी-दादा -नानी-नाना ,बुआ और दो चाचा ,
फूफा ,मामा-मामी, भाभी, जीजा ,मौसी मौसा
यहाँ आंटी-अंकल तक व्यवहार सिमट जाता है !
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दीपक ले दीवाली आती,रंग लुटाती होली ,
लोड़ी पर भर जाती अपनी भुने अन्न से झोली ,
गर्मी में आ मानसून पानी बरसा जाता है.
*
रक्षाबंधन सारी बहने लातीं सुंदर राखी ,,
बड़े प्यार से मीठा मुँह कर भेंट हमारी पातीं ,
कृष्ण -अष्टमी झाँकी में सबने प्रसाद बाँटा है .
*
नीम डाक्टर पेड़ खड़ा है अपने दरवाजे पर
पीपल की ठंडी छाया में बैठो सत्तू खा कर
उनकी छाया रोग एलर्जी झट से भग जाता है
*
चाँद निकलता था छत पर जा कर देखा ध्रुव तारा ,
सप्तऋषि के सातों को हमने ले नाम पुकारा .
इन सबका हम सबसे ही जाने कब का नाता है .
*
शादी मुंडन ,गोद भराई या फिर कहीं रहे सगाई ,
केसरवाला दूध पियो या घुटी हुई ठंडाई ,
नाच और गानों में ही सप्ताह निकल जाता है ,
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मिले ईद पर सेवइयाँ औ'बैसाखी पर हलवा ,
दुर्गापूजा में नाचेगा झूम-झूम कर ललुआ ,
साँझ पड़े तुलसी चौरे पर दीपक जल जाता है !
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बुधवार, 14 जुलाई 2010

कृ्ष्ण-भक्ति का फ़ण्डा

*
नहीं समझ में समा रहा है भगत तुम्हारा फ़ण्डा !
गंगा जल से धो कर जैसे होय निरामिष अंडा !
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मरद-जात है या मेहरारू पता नहीं क्या चक्कर !
कुछ न बताये कोई, सारे चुप रह जाते हँसकर !
सब्ज़ीवाले सच सच बतला ,घुइयाँ है या बंडा !
*
धरी उतार कड़क वर्दी , पहनी घाघरिया चोली ,
पाँव महावर, रँगे होंठ , पर चुगली करती बोली !
बजा तालियाँ ठुमक ठुमक कर नाच रहे हैं सण्डा !
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गलियों का हुड़दंग देख कहती थीं मेरी नानी ,
अब समझी हूँ अर्थ और तुक, जो थी बात पुरानी - 3
'घर चून न बाहर कंडा ,होरी खेलें संड-मुसंडा !'
*
कितना कुछ पाया जीवन में गई न मन की तृष्णा,
कुण्ठित मन में विकृत लालसा मुख पर कृष्णा कृष्णा.
चेले चाँटी साथ लग गये करने वाग्वितण्डा !
*
गीता- ज्ञान भाड़ में, ऐसी तैसी कर ड्यूटी से ,
सब कुछ छोड़ मुरीद बन गये मधुबन की क्यूटी के !
कुछ भी कह लो ध्यन लीन हैं ,बगुला भगत अखण्डा !
*
अंहाँ गोपिका ग्रामवासिनी नवल-किशोरी भोली ,
खेला खाया घाघ चलाये कहाँ नयन से गोली
नहीं अजूबा ऐसा देखा सप्त द्वीप नव खण्डा !
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रंग रास अब रास आ रहा औरों से क्या नाता ,
जिसको आना हो आये जाये जो होवे जाता !
पीछा छूटे घरवाली से ऐसा करो प्रबन्धा !
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चनिया चोली चुनरी धारण कर लो सभी सिपहिया
चूड़ी पहन बाँध लो घुँघरू नाचो ताता थैया !
या ग्वाले बन साथ निभाओ लिये हाथ में डण्डा
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लचका कमर ,लगाते ठुमके , मटकें हाथ नचाकर !
नगर नगर में करे नुमायश दिखला त्रिया चरित्तर!
यहाँ दाल में काला है कुछ , बतला देगा अन्धा !
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विधि की अनुपम रचना का कैसा मज़ाक यह भद्दा ,
ऊपर से प्रभु-इच्छा बतला और जड़ दिया रद्दा !
घाट-घाट का पानी चक्खा अब चल, बजा मृदंगा !
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ग्रामर जिसने पढ़ी छोड़ दे नर नारी का चक्कर ,
कामन भी ये नहीं, बहुत संभव, हों न्यूटर जेंडर !
सुनी शिखण्डी की चर्चा पर अब तो प्रकट शिखण्डा !*

सोमवार, 12 जुलाई 2010

चटखारे -

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जा रही पड़ोसन के घर मैं पर-चर्चाओं का रस पाने ।
अपने ही गली -मोहल्ले की कुछ मज़ेदार ख़बरें लाने !
मुझको न और, उसको न ठौर, गाड़ी खिंचती जाती आगे ,
खबरें दुनिया भर की, इक दूजे बिना भला किससे बाँटें !
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हम इक दूजे के साथ बहुत अपनापन हरदम दरशाते ,
जैसे ही पीठ फिरी, मुख बिचका कर उससे छुट्टी पाते !
अपने को क्या करना भइया, ये दुनिया रंगरँगीली है ,
तुमको बतला दी बात सखी ,आगे की खबर रसीली है!
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देखना, भागनेवाली है कोनेवाले घर की लड़की ,
गुप्तन की झड़प बहू से- ऊपर ही है मेरी तो खिड़की !
दो दिन से महरी गायब है वर्मा घर में झाड़ू देते
वर्माइन ,मुँह लपेट लेटीं ,वे बेचारे बर्तन धोते !
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दीवारों के भी कान, नाम मत ले देना मेरा बहना !
मैंने तुमसे कह दिया किन्तु तुम और किसी से मत कहना !
हम दोनो एक दूसरी की असलियत जानती हैं सारी ,
इसलिये सामने सदा साथ देते रहने की लाचारी !
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दुनिया भर की पंचायत का जिस दिन न स्वाद मिल पाता है
रातों को नींद नहीं आती रह-रह कर पेट पिराता है !
भोजन में गरम मसाले से आ जाता जैसे स्वाद नया ,
जितने मुहँ उतनी बातें, जुड़ जाता हर बार प्रवाद नया !
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हमको तो शौक यही भैया चीजें स्वादिष्ट बनाने का ,
चटपटी मसालेदार बना ,चटखारे लेकर खाने का !
फिर नमक-मिर्च के साथ कान में औरों के पहुँचाते हम ।
रस का आनन्द बाँट कर सबको परम शान्ति -सुख पाते हम !
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