बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

का कर लेई काजी

मोहे टी.वी. मँगाय दे मैं टिविया पे राजी !
जा पै होइ रँगवारो टीवी करौं ओही से सादी !
*
काला और सुपेद न भावै ,टीवी बस रंगवारो ,
बिना रँगन को मजा न आवे तुमहू नेक विचारो !
छैल-छबीली फर्वट छोरी दो करवाय मुनादी
*
मरद चलेगा लंबा-नाटा काला-गोरा कोई,
मोटा पातर,मूँछ-निमूछा फरक पड़े ना कोई !
दिन भर बाहर रहै मरद ,रौनक टीवी से हाँ ,जी !
*
बंदर जैसा हो कोई , जा की महरारू सुन्दर ,
हर देखैवाले के हिय मां हूक उठै रह रह कर !
सरत लगा ले कोई चाहे ,हौं ही जितिहौं बाजी !
*
पढ़ी-लिखी तो नहीं खास पर समझूँ ढाई आखर ,
उइसे ही सब कहें सयानी ,का होई पोथी पढ़
ज्यादा पढी-लिखी छोरी तो लगे सभी की दादी !
*
जइस खुदा जी खुदै देत सक्कर खोरेन का सक्कर ,
हमरा भी हुइ जाई कलर टीवी वाले सों चक्कर
टी.वी.वाला राजी तो फिन का कर लेई काजी !

चंदन के फूल

*
चँदन केर बिरवा मइया तोरे अँगना
कइस होई चँदन क फूल !
*
कनिया रहिल माई बाबा से कहलीं ,
लेइ चलो मइया के दुआर !
केतिक बरस बीति गइले निहारे बिन
दरसन न भइले एक बार !
हार बनाइल मइया तोहे सिंगारिल ,
चुनि-चुनि सुबरन फूल !
*
जइहौ हो बिटिया, बन के सुहागिनि ,
ऐतो न खरच हमार ,
आपुनोई घर होइल आपुन मन केर
होइल सबै तेवहार !
बियाह गइल , परबस भइ गइले हम ,
रे माई तू जनि भूल !
*
ना मोर पाइ धरिल एतन बल ,
ना हम भइले पाँखी !
कइस आइल एतन दूरी हो
कइस जुड़ाइल आँखी !
कोस कोस छाइल गमक महमही ,
पाएल न चँदन क फूल !
*
आपुनपो लै लीन्हेल गिरस्थी
अब मन कइस सबूरी !
चँदन फूल धरि चरन परस की -
जनि रह आस अधूरी !
विरवा चँदन ,गाछ बन गइला
मइया अरज कबूल !
*

माँ री, बुला एक बार

फिर से उसी घर में थोड़ा थोड़ा-सा रह लूँ माँ री, बुला एक बार !
*
ससुरे के आँगन में पड़ने लगेीजब से सावन की बदरी की छाया,
कुंडी दुआरे की खटके जरा ,यों लगे कोई मैके से आया !
पग को तो बिछुये महावर नें बाँधा ,सासुर की देहरी पहाड़ !
*
काहे को बिटिया जनम दिये मइया,क्यों सात फेरों में बाँधा
इतनी अरज मेरी सुन लीजो बीरन टूटे न मइके का धागा !
भौजी मैं चाहूँ न सोना ,न चाँदी ,तुम्हरा तिनक भर दुलार !
*
निमिया के झूले से नीचे उतारी छिनी सारी बचपन की सखियाँ ,
ऐसा न कोई दिखे जिससे कह पाऊं खुल के मैं सुख-दुख की बतियाँ !
ननदी करे अपने भइया को रोचना मन को सकूँ ना सम्हार !
*
होकर परायी, नयन नीर भर, पार कर आई निबहुर डगरिया
तूने भी भैया पलट के न देखी कैसी बहन की नगरिया !
काहे को बाबुल सरगवास कीन्हा ,छोड़ी धिया बीच धार !
माँ री, बुला एक बार .... !

ससुरारै में निदिया सताये रे

ससुरारै में निदिया सताये रे ,
जी भर के कबहुँ ना सोय पाय रे
मोरी अक्कल चरै का चलि जात हौ,
ससुरारै में बावरी सी हुइ गई !
*
सैंया बोले गैया को चारा डालना ,
मैं भइया सुन्यो निंदिया की झोंक में ,
छोटे देउर को नाँद में बिठा दियो ,
और आय के बिछावन पे सोय गई !
*
बहू बछिया गुवाले को सौंप दे ,
मैं बिटिया सुन्यो निंदिया की झोंक में ,
तो ननदिया को पहना-उढ़ाय के ,
आपने कंठ से लगाय मिल-भेंट ली ,
और जाय के गुवाले को दे दिहिन !
फिर आय के बिछावन पे सोय गई !
*
मैरी दवा की पुड़िया बहू लाय दे,
हवा-गुड़िया सुन्यो नींद के खुमार में !
लाई रबड़ की बबुइया ढूँढ खोज के ,
आगे बढ़ के ससुर जी पे उछाल दी,
और आय के बिछावन पे सोय गई !
*
पहने कपड़े बरैठिन के दै दियो ,
कह दीजो हिसाब पूरो हुइ गयो!
गहने कपड़े सुन्यो मैं आधी नींद में ,
उनके बक्से से जेवर निकाल लै,
और जोड़े धराऊ में लपेट के
धुबिनिया को पुटलिया पकड़ाय दी
और लेट के बिछावन पे सोय गई !
*
हँडिया दूध की अँगीठी पे चढ़ाय दे ,
थोड़ो ईंधन दै के आँच भी बढ़ाय दे ,
चार मुट्ठी भर झोंक दियो कोयला ,
हाँडी गोरस की धरी वापे ढाँक के
और आ के बिछावन पे सोय गई !
*
जाने कैसे मैं लेटी औंघाय गई ,
दूध उबल-उबल सारा जराय गा ,
सारा हाँडी का रंग करियाय गा !
मैंने टंकी में चुपके डुबाय दी ,
और जाके बिछावन पे सोय गई !
*
मारे नींद के कुछू न समझ आय रे ,
ससुरारै मे बावली सी होय रई !
*

छिंगुनिया के छल्ला

*
छिंगुनिया के छल्ला पे तोहि का नचइबे ,
नथुनियाँ न झुलनी न मुँदरी जुड़ी ,
आयो लै के कनैठी अंगुरिया को छल्ला !
इहै छोट छल्ला पे ढपली बजइबे !
*
कितै दिन नचइबे ,गबइबे ,खिजइबे
कसर सब निकार लेई ,फिन मोर लल्ला
कबहुँ गोरिया तोर पल्ला न छोड़ब ,
चिपक रहिबे बनिके तोरा पुछल्ला !
करइ ले अपुन मनमानी कुछू दिन
उहै छोट लल्ला तुही का नचइबे !
*
भये साँझ आवै दुहू हाथ खाली
जिलेबी के दोना न चाटन के पत्ता ,
मेला में सैकल से जावत इकल्ला ,
सनीमा के नामै दिखावे सिंगट्टा !
हमहूँ चली जाब देउर के संगै
उहै ऊँच चक्कर पे झूला झुलइबे !
*
काहे मुँहै तू लगावत सबन का
लगावत हैं चक्कर ऊ लरिका निठल्ला !
उहाँ गाँव माँ घूँघटा काढ रहितिउ ,
इहाँ तू दिखावत सबै मूड़ खुल्ला !
न केहू का हम ई घरै माँ घुसै देब ,
चपड़-चूँ करे तौन मइके पठइबे !
*
लरिकन को किरकट दुआरे मचत ,
मोर मुँगरी का रोजै बनावत है बल्ला ,
इहाँ देउरन की न कौनो कमी
मोय भौजी बुलावत ई सारा मोहल्ला !
छप्पन छूरी इन छुकरियन में छुट्टा
तुहै छोड़, कहि देत, मइके न जइबे !
*
मचावत है काहे से बेबात हल्ला ,
अगिल बेर तोहका चुनरिया बनइबे ,
पड़ी जौन लौंडे-लपाड़न के चक्कर
दुहू गोड़ तोड़ब घरै माँ बिठइबे !
छिंगुनियाके छल्ला पे ...!
*

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

गंगा-जमुना

नैहर की सुधि अइसी उमडल हिया माँ ब्याकुल उठे हिलकोर ,
आगिल क मारग बिसरली रे गंगा घूम गइलीं मइके की ओर !
*
बेटी को खींचे रे मइया का आँचल टेरे बबा का दुलार ,
पावन भइल थल ,पुन्यन भरी भइली उत्तरवाहिनी धार* !
जहि के अँगनवा में बचपन बिताइन बाँहन के पलना में झूलीं
तरसे नयन,जुग बीते न देखिन, जाइत बहत चुप अकेली !
*
केतन नगर , वन ,पथ कइले मिली ना बिछुडी सहिलियाँ,
मारग अजाना बही जात गंगिया अकेली न भइया- बहिनियाँ !
कौनों दिसा बहि गइली मोरी जमुना,कैसी उठी रे मरोर !
मइया हिरानी रे ,बाबा हिराने जाइल परइ कौने ठौर !
*
ब्रज रज रचे तन, श्याम मन धरे मगन , देखिल जमुन प्रवाह,
दूरइ ते देखिल जुडाय गइली गंगा,अंतर माँ उमडिल उछाह !
जनम की बिछुडी बहिनी मिलन भेल , झलझल नयन लीने मूँद,
पलकन से बहबह झर- झर गिरे, रुक पाये न अँसुआ के बूंद !
*
व्याकुल ,हिलोरत दुहू जन लिपटीं उमडिल परेम परवाह,
दूनों ही बहिनी भुजा भर भेंटिल,तीरथ भइल परयाग !
दोनो के अँसुआ बहल गंगा-जमुना,इक दूजे में मिल हिरानी ,
धारा में धारा समाइल रे अइसे ,फिर ना कबहुँ बिलगानी !
*
लहरें- लहर सामर संग उज्जल गंगा-जमुन का मिलाप
अइसी मिलीं कबहूँ ना बिछुडलीं सीतल भइल तन ताप !
हिय माँ उमड नेह ,कंपित भइल देह गंगा भईं गंभीर
चल री सखी,मोर बहिनी चलिय जहँ सागर भइल सरीर !
(* गंगा का प्रवाह जब उत्तरगामी होता है तो उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है ।)

नचारी - गौरा का सुहाग

गौरा का सुहाग -
नैना भरे माई दिहिले , सुहाग भर भर हंडा ,
एतन सुहाग गौरा पाइन धूम भइल तिहुँ खण्डा !
मारग में सगरी मेहरियाँ दौरि आवन लगलीं ,
गौरा के चरनन लगलीं सुहाग पावन लगलीं !ओ

खेतन ते भागी, पनघट ते भगि आई ,घाटन से दउरी धुबिनियाँ ,
गोरस बहिल ,ऐसी लुढकी मटकिया तौ हूँ न रुकली गुजरिया ,
दौरी भडभूजी ,मालिन ,कुम्हारिन , बढनी को फेंक कामवारी
गौरा लुटाइन सुहाग दोउ हाथन ,लूटेल जगत के नारी ।
ऊँची अटारिन खबर भइली , पहरे -ओढे लागीं घरनियाँ ,
करिके सिंगार घर आंगन अगोरे तक बचली फकत एक हँडिया ।
चुटकि-चुटकि गौरा उनहिन को दिहला ,एतना रे भाग तुम्हारा ,
दौरि दौरि , लूटि लूटि लै गईं लुगइयां ,जिनके सिंगार न पटारा !
एही चुटकिया जनम भर अगोरो ,मँहगा सुहाग का सिंदुरवा ,
तन मन में पूरो, अइसल सँवारो रंग जाये सारी उमरिया !

भुरजी ,कुम्हरिन से जाँचित चुटकि भर, कन्या सुहाग भाग मांगे ,
गौरा की किरपा भइल कमहारिन पे जिन केर सुहाग नित जागे !

गौरा का सेंदुर अजर अमर भइला ,उन जैसी कौ बडभागिन रे ,
इनही से पाये सुहाग, सुख, दूध, पूत ,तीनिउँ जगत की वासिन रे ।