सोमवार, 19 अप्रैल 2010

एक -चित्र

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भोर भयो ,दुलहिन निकरि गई भुरहरे ही
पति सोवत रहे दिन चढ़े उजारे लौं ।
जेठ ननदोई सबै अंगना बिराज रहे
न्हाय-धोय दुलहिन आय गई रसुइया मां!
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लाल लाल चुनरी सितारन से टँकी जाकी ,
किरन किनारी की आनन पे छाय रही,
बैठि गई जिठनी के तीर आय चउकी पे
भाल लगी बिंदिया कइस मोहिनी सी डारि रही!
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कहाँ गयो सारो ननदोई पुकारि रहे
अबहूँ न नींद खुली दिन चढ़ि आयो है
सोयो सो लरिका अँगड़ात- जमुहात भयो
बाहर निकरि अँगना में आय ठाड़ो है !
*
भइया मुँह दबाये हँसैं ,जीजा को अट्टहास
छुटका मुसकाय मौन तकै जात सामुने ,
औंचक सो भौंचक सो समझ न पायो कुछू
ठाड़ो चकरायो कहा रच्यो इहाँ राम ने ।
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भाभी निकरि आई रसोई से हँसी से भरी-
'कुर्ता पे छाय रहे सेंदुर के दाग रे
अइना में जाय रूप आपुनो निहार लेहु
मुख दिखात घड़ी जइस बारह बजाय के.'
*
गूँजी समवेत हँसी, कमरा में भागि गयो
कौन परे फालतू इहाँ की खुराफात मं
नयो -नयो पति भकुआयो सो रहे चुप्प
छेड़ रहे सिगरे इहाँ तो बात-बात में !
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शुक्रवार, 26 मार्च 2010

हमको क्या करना

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हमको क्या करना .
भरने दो उसकी बारी है ,
सही-ग़लत जो हो ,
अपने को क्या फ़र्क पड़ेगा ,
खा-पी ले और सो !
जब हम पर आये देखेंगे ,
व्यर्थ यहाँ फँसना.!
*
हम काहे को पड़ें बीच में ,
औ विरोध झेलें
पड़े बीच में काहे
जिस पर आई वो झेले
जिस करवट से ऊँट रहे
बस दे दो मत अपना
*
कोई बढ़े-चढ़े क्यों आगे ,
दुनिया के चक्कर ,
हज़म न कर पायेगा कोई ,
देगा ही टक्कर .
देख तमाशे सबके ,
बस सिर बचा रहे अपना
*
सबसे मीठा बोलो ,
चाहे सच चाहे झूठा ,
अपना काम निकालो
चाहे टेढ़ा या सीधा .
सारे प्रश्न दफ़ा कर
चाहे जैसे मौज मना
*
कोऊ भी नृप होय ,
हमें का होवेगी हानी ,,
अपनी ढपली बजा,
यही नुस्खा है लासानी

अपना मतलब पुरे ,
और फिर हमको क्या करना!

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

नचारी - होरी के हुरंग में..

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होरी के हुरंग में देखोई सारदा को रूप
सारी सुपेद सारी कइसन रँगाय गई .
पुस्तक के आखरन पे छायो अबीर,
सेत सतदल की पाँखुरी गुलाल सों छिटाय गईं,
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ढोल बजे ढम-ढम ,मँजीरन की झमक-गमक,
चंदन परि पाँखुरी पलास लिपटाय गई.
पुस्तक बहावन की बात करत रहे ताकी ,
अटपटी बानी पे खुदै बानी रिझाय गईं.
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बीना के तारन पे बजन लाग लोक- राग ,
सुर की तरंग मंत्र-गान बिसराय गई.
बहिनी पे रंग, आँख फारि देखि रहे संभु,
चूकीं न भवानि ननदी को बोल मारि गईं -
*
'बनी बड़ी कुमारी, कलावती अरु ज्ञानमती .
भइया की भांग लगत बहिनी चढ़ाय गईं .
सतगुन की साधिका ह्वै रहैं अविकारी गिरा ,
माधव मदन ऋतु पाय फगुनाय गईं .'
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गौरा के बोल सुनि बानी मुसकाय रहीं,
मति मारी गई भौजी की, समुझाय को ,
भइया को देखि सकुचाय के कबूल दियो ,
परतिभा की विनती के हठ के सुभाय को .
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रंगीन चसमा दै दीठ भरमाई अइस
अविकार सदा मोर उज्जर पवित्रता
कामना पुराय तासों इन्द्रजाल रच्यो इहाँ,
सबै अरुझाय गये ,देखि के विचित्रता
*
जेहि ठौर राजें हंसवाहिनी सरस्वती-माँ
तहाँ प्रतिभात रहे मति की समग्रता
निर्मल-धवल सुश्लोक सदा वरदायिनी हे,
छमिहो हमार दोष तीन लोक अर्चिता !

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

को बचाय रे

मास्टर ओंकाल्लाल हिन्दी पढ़ावत में,लिखो कुछू और कुछू और बोल जात रहे
लरिका मुसुकायँ देखें दायें और बायें जबै खैनी धरी हथेली पे ताली दे सजाय के

मल्हार राव एक कारों भुजंग सो हो देखत ही बोलत सनीचर सो दिखात है ।
अउर ई मल्हरवा पाठ कबहुँ याद ना करै अकलै में नाहिं वाके घुसति कोऊ बात है

ओंकाल्लाल की खेनी से पियरे हाथ गदगदी गद्दी सम दनादन कूटे जात हैं ।
दाँतन में खैनी दबाय हड़काय रहे गोल-गोल आँखिन मा गुस्सा मिची जात हैं

गोल-मोल देह ,ऊँची धोती पे सलूका फूले गाल सबै लरिकन में ढब्बू जी कहात हैं
अरे हट काला डूँड सनीचर बज्जर मसान मुख से उचारि रहे मार गुस्साय के

झपाक् झापड़ थप्पड़न का को गिनात रौरा मचात हाय हाय ,हाय हाय बप्पा रें
उछल -उछल चीख रहो कूदि-कूदि जात लरिकन में सोर ढब्बूजी सों को बचाय रे

होई का बखानि के

मालवा की धरती की साँवली -सी माटी को सौंधा संग संग हमार डोलत लगे-लगे
नदियन को उहै जल सूखि नहीं पावत हमार नयना में समायो पिरीत पगे !
जीवन को नेह भरि ,आपुनपो देइ करि अन्न से रची ई देह रचना उहै की है
बोल-चाल रीत-भाँत सहज सुभाव अउर निहछल वेवहार की परतीत भी उहै की है ।
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लरिकिन के स्कुलन को टोटा रहे तबै हम पढ़े रहे सदा लरिकन के साथ में ।
सबसे ज्यादा नंबर हमारे ही आवत,मानो ना तो पूछ आउ जाइ आस-पास में
लरिकिन के पढ़न को परबंध कहां रहे तबै घरै बैठ जाति पास हुई दर्जा पाँच में
हम तो सातवी किलास पे ही परवेस लियो जामेटरी एलजबरा पढ़े सबै का साथ में
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मदन लाल इँगलिस को खींच-खींच बोले जौन मुँह में खटास वाके घुलीघुली जात हौ
एक संग्राम सिंग हरी सिंग से कहे कहत रहे टपक सून्द्री बियाह लावेगो बाद को
भँवर सिंग पैरेलल को कहत रहे प्यारे लाल मुस्किल ह्वै जात संग बैठनो किलास में ।
एक बेर संगरमवा पेड़ तरे खड़ो रहे ,तबै ही ततैयन ने झपट्टा मारि घात में .

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हाय-हाय करि बिलखात भागो चप्पल छोड़ि ,कुरसी के आस-पास कूदै मार चिल्लाय के
मारे दरद मुँह लाल लाल भयो गाल नाक हाथ मूँ पे हू  ततैया डंक छाये के
हाय,हाय,हाय,संगराम बिलखाय ,हरी सिंग छोट भाय कहै कहा करौं माय रे
भागमभाग सब मचाय ,कुछू पावैं ना उपाय तिन्हें कउन समुझाय के कुछू तो बताय रे !
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ततैया सुभाव ,देखे आव नाहीं ताव ,जौन पावे आस-पास डंक मारि तड़पाये रे !
भंवर सिंग दौर पर्यो  कुप्पी उठाय लायो डारि -डारि घासलेट बिलबिलात गात पे
पीर ना पटाय संगराम चिल्लाय बावलो सो नाच कूद रह्यो चैन परे नाहिं रे
दौरि-दौरि लरिकन के झुंड आय छाय, सबै बन्दरन की नाईं झाँकि आँखि फार-फार के
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मास्टर के रोके, कोई रुके नाहिं अँधाधुंध भागे सारे छोरे मार हू ते ना डेराय ही
तीनि लरकिनी ,हमार साथ अउर दुइ जनीं ,परमिला औ'सान्ती रहे उहै किलास की
का करैं रुबास आय , हँसी आय,  भाँत-भाँत छोरे घिरेआसपास के सारे किलास के
केहू भाँति रास्ता बनाय निकरि आये, अउर आपुन घरै घुसे जाय तुरत भागि-भागि के ।
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ई तो एक दिन की कहानी भई ,भइया रे ,
और का बतावैं ,का करिहौ अउर जानि के
कालीसिंध नद्दी और सोनकच्छ कस्बा को
हाल मजेदार पर का होई का बखानि के !

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

छिनाय गयो हमरो ही नाम ,

आजु तो न्योति के बिठाई रे कन्या
हलवा पूरी औ'पान
सोई बिटेवा ,परायी अमानत ,
चैन गा सब का पलान !
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कल ही लगाय के हल्दी पठइ हौ
मिलिगा , सो ओहिका भाग
आपुन निचिन्त हनाय लीन गंगा
बियाह दई, इहै बड़ काज !
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एकइ दिन माँ बदल गई दुनिया
छिन गयो माय का दुलार
बियाह गयी कन्या ,
समापत भा बचपन
मूड़े पे धरि गा पहार !
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सातहि फेरन पलट गई काया
गुमाय गई आपुन पहचान !
बिछुआ महावर तो पाँयन की बेड़ी
सेंदुर ने छीन्यो गुमान !
हमका का चाहित हमहुँ नहिं जानै ,
को जानी , हम ही हिरान !
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आँगन में गलियन में ,
बिछड़ी सहिलियन में,
हिराइगा लड़कपन हमार
छूट गयो मइका ,
लुपत भइली कनिया,
बंद हुइगे सिगरे दुआर !
ऐही दिवारन में
उढ़के किवारन में सिमटि गो हमरो जहान !
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रहि गई रसुइया ,
बिछौना की चादर ,
भीगी फलरियाँ औ'रातन को जागर !
अलान की पतोहिया ,
फलान की मेहरिया ,
ढिकान की मतइया ,
बची बस इहै पहिचान !
मर मर के पीढ़ी चलावन को जिम्मा .
हम पाये का का इनाम ?
छिनाय गयो हमरो ही नाम ,
मिटाय गई सारी पहचान .
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मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

ठेल रहे बेकार

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दस-दस दिन पहले यहाँ दे-दे धक्का मार,
चले जा रहे बरस को,ठेल रहे बेकार !
इत्ते दिन बीते जहाँ ,सबर करो कुछ और
दिन तो पूरे करेगा बेचारा लाचार !
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थोड़े दिन की बात है , अभी समय है शेष
अपने आप खिसक रहा ,फिर क्यों खींचो केश ,
जाते इस मेहमान की कर लो ख़ातिर और ,
हो सकता कुछ और रंग दिखला दे अवशेष !
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