रविवार, 21 नवंबर 2010

बहिनी का भाग.

*
तेरी कमाई में ओ,मेरे भइया कुछ तो है बहिनी का भाग ,
इक नया पैसा हजार रुपैया में ,बस इतना कर दे निभाव ,
*
भौजी को गढ़वा हे हीरे के गहने ,कांच की चुरियाँ मोय ,
मइके इतना ही मान बहुत रे ,तेरी तरक्की होय.
बरस में दो दिन पाऊँ वो देहरी ,इतना सा मन का चाव.
*
ये ही बहुत रे ,चिठिया पठा दे आए जो तीज-तेवहार
मइया औ बाबा किसके रहे रे ,भइया से मइका हमार .
फिर तो ये मेरा, तेरा वही घर, जीवन का ये ही हिसाब.
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माँ जाए भाई सा दूजा न कोई ,दरपन सा निहछल भाव .
भइया की भेंटें ऐसा लगे मइया पठवा दिहिन है प्रसाद,
सुख हो या दुख,गए मौसम के, रुख पर तेरा न बदला सुभाव .
*
बचपन के सुख को जी लूँगी फिर से बाँधूँगी यादों की गाँठ ,
संबल बनेंगी रँग से भरेंगी ,जब भी जिया हो उचाट .
देखूँ तुझे सियरावे हिया, लागे बाबुल की छू ली छाँव .
*.

4 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

देखूँ तुझे सियरावे हिया, लागे बाबुल की छू ली छाँव .
कितना कोमल भाव पिरोया है आपने
बहुत सुन्दर

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

बचपन के सुख को जी लूँगी फिर से बाँधूँगी यादों की गाँठ ,
संबल बनेंगी रँग से भरेंगी ,जब भी जिया हो उचाट .
देखूँ तुझे सियरावे हिया, लागे बाबुल की छू ली छाँव .

कविता पढते पढते आंखें नम हो गईं । बहुत ही सुंदर रचना ।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

आपका ब्लॉग देख कर प्रसन्नता हुई। मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!

Taru ने कहा…

बहुत ही बढियां लोकगीत है..बहुत ही maarmik...abaadh बहता hua......jaane man ke kaun kaun se kone chhu aaya......:):)

कांच की चुरियाँ मोय,

..behnon ki kitti si khwaahish hoti है....:)

बरस में दो दिन पाऊँ वो देहरी ,इतना सा मन का चाव.
...यहाँ तो मेरी 'पिन्नी' आँखें भर आयीं...:'(

'देखूँ तुझे सियरावे हिया, लागे बाबुल की छू ली छाँ'

जैसे तैसे ऊपर की पंक्ति में संभाला..आगे पढ़ा..तो यहाँ तो फिर ह्रदय का बाँध ही टूट गया....हाँ मगर यहाँ आँखें नहीं बरसी....भीतर ही भीतर दिल की कोई नाज़ुक रग चटकती रही.....:)

मगर कोई बात नहीं....आपने लिखा ही इत्ता अच्छा था...मेरे जैसे प्राणी के लिए ये तो बहुत स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया थी......:):)

हर एक पंक्ति दिल से होकर गुजरी..अमूमन लोकगीत बहुत नहीं पढ़ें हैं...स्कूल में कभी कभार नृत्य किया है उन पर बस उतना ही....हम्म.....आप सच्ची में बहुत पकड़ रखतीं हैं हिंदुस्तान पर....:)
अप्रतिम है आपका काव्य सौन्दर्य....इतनी छोटी हूँ..कि तारीफ करते हुए भी डर लगता है..:(

खैर...
अबसे आपकी रचनायें कम-कम पढूंगी...दिन में एक बस....जल्दी जल्दी पढ़ लिए सारे ब्लॉग तो.....फिर कित्ता खालीपन आ जायेगा न :) ....
आपसे एक निवेदन..जब कभी कोई किताब प्रकाशित हो आपकी...या हो चुकी हो..तो कृपया neeru24jabalpur@gmail.com पर मुझे बता देवें........यहाँ नेट पर पढने में वो लज्ज़त नहीं होती जो किताबों के पन्ने पलटते हुए आती है...:)

चलिए फिर...शुभ रात्रि...:)
aur dher saari badhayi is lokgeet ke liye...:):)