बुधवार, 4 नवंबर 2009

नचारी -ओ,नटवर

दुनिया के देव सब देवत हैं माँगन पे ,
और तुम अनोखे ,खुदै मँगिता बनि जात हो !
अपने सबै धरम-करम हमका समर्पि देओ ,
गीता में गाय कहत, नेकु ना लजात हो !
*
वाह ,वासुदेव ,सब लै के जो भाजि गये,
कहाँ तुम्हे खोजि के वसूल करि पायेंगे !
एक तो उइसेई हमार नाहीं कुच्छौ बस ,
तुम्हरी सुनै तो बिल्कुलै ही लुट जायेंगे!
*
अरे ओ नटवर ,अब कितै रूप धारिहो तुम ,
कैसी मति दीन्हीं महाभारत रचाय दियो !
जीवन और मिर्त्यु जइस धारा के किनारे खड़े,
आपु तो रहे थिर ,सबै का बहाय दियो !
*
तुम्हरे ही प्रेरे, निरमाये तिहारे ही ,
हम तो पकरि लीन्हों तुम छूटि कितै जाओगे !
लागत हो भोरे ,तोरी माया को जवाब नहीं,
नेकु मुस्काय चुटकी में बेच खाओगे !
*
एक बेर हँसि के निहारो जो हमेऊ तनि ,
हम तो बिन पूछे बिन मोल बिकि जायेंगे !
काहे से बात को घुमाय अरुझाय रहे ,
तू जो पुकारे पाँ पयादे दौरि आयेंगे !

2 टिप्‍पणियां:

Taru ने कहा…

bahut sundar kavita Pratibha ji..:):)

Avinash ne kal hi aapka blog link diya......aur aaj time nikal kar aapke blogs khangal rahi hoon.......

is kavita ko dekh k raha nahin gaya...viraam lena hi pada kuch likhne ke liye.....



aapki aagya ke bina is kavita ko apne saath le ja rahi hoon...aapki pehchan ke sath......muaaf kijiyega dhrishtta ke liye...:(


aapki creations padhkar....un par kuch kehna sambhav nahin hai..meri tuchh buddhi keh bhi nahin paayegi...seekh sakoon aapse bas itni cheshta hi rahegi...

:)

chaliye.....
ab aage badhti hoon....

Chandra Prakash ने कहा…

बहुत ही सुंदर और मन को स्पर्श करने वाली रचना !!