बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

अश्वत्थामा-

अश्वत्थामा -
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जरा सा घी दे दे माई !जरा सा माई दे दे घी !
मारता टीस घाव मेरा !
प्रभू कल्याण करे तेरा ! जरा सा ..
घरनिया निकली घर में से ,
बटोही, घाव हुआ कैसे ?
सबै करनी का फल आही !.. जरा सा
बड़ो ऊँचो-पूरो लरिका ,
किन्तु मुख पीड़ा से मुरझा ,
बात वह समझ नहीं पाई ! जरा सा
खून और पीप रिसा आता ,
बैद को जाकर दिखलाता !
न,इसकी दवा नहीं पाई !जरा सा ..
कहाँ से चोट मिली भइया ?
पुरानी कितनी हे दइया !
देख कर टूट रहा है जी !जरा सा ..
हुआ विचलित देखे से मन ,
कर रहा तू दिन-रात सहन,
किसी को दया नहीं आई ?जरा सा ..
न पूछो माँ, बस दे दो घी ,
शान्त कुछ हो जायेगा जी !
व्याधि का पार नहीं कोई ! जरा सा ..
हथेली घी धर लौट चला ,
देखती घरनी गया चला !
हिया में करुणा भर आई !जरा सा ..
कौन यह और कहाँ रहता
भयानक पीड़ा को सहता !
कोइ तो बतला दे भाई ! जरा सा ..
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अरे ऊ अश्वत्थामा रहे ,
महाभारत का पापी अहै !
ज्योति-मणि थी मस्तक पाई ! जरा सा
द्रौपदी ने तो जीने दिया ,
किंतु अर्जुन ने दंडित किया !
काट शिरमणि ली ज्योतिमयी ! जरा सा
द्रौपदी के पाँचहु बारे ,
सोवते माँहि मारि डारे !
इहै गति है उस पातक की !जरा सा ..
शाप है ई चिरकाल जिये ,
कोटि बरसों तक ये दुख सहे !
न आये इसको मृत्यु कभी !जरा सा ..
जनावत नहीं नाम अपुनो,
कहीं पहचान न ले कउनो !
व्याधि का अंत कहाँ इहकी !जरा सा ..
अरे अब छिमा करौ ओहिका ,
प्रभो ,करि देउ मुक्त लरिका !
घरनियां ने अस बात कही ! जरा सा
कौन है इहाँ दूध का धुला ,
बड़े ऊँचे -ऊँचन ने छला !
कलपती हुइ है मातु कृपी !जरा सा ..

2 टिप्‍पणियां:

Smart Indian ने कहा…

हृदय पिघलाने वाला कारुणिक वर्णन :(

अर्चना चावजी Archana Chaoji ने कहा…

कितनी पीड़ा ...ओह!