बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

माँ री, बुला एक बार

फिर से उसी घर में थोड़ा थोड़ा-सा रह लूँ माँ री, बुला एक बार !
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ससुरे के आँगन में पड़ने लगेीजब से सावन की बदरी की छाया,
कुंडी दुआरे की खटके जरा ,यों लगे कोई मैके से आया !
पग को तो बिछुये महावर नें बाँधा ,सासुर की देहरी पहाड़ !
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काहे को बिटिया जनम दिये मइया,क्यों सात फेरों में बाँधा
इतनी अरज मेरी सुन लीजो बीरन टूटे न मइके का धागा !
भौजी मैं चाहूँ न सोना ,न चाँदी ,तुम्हरा तिनक भर दुलार !
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निमिया के झूले से नीचे उतारी छिनी सारी बचपन की सखियाँ ,
ऐसा न कोई दिखे जिससे कह पाऊं खुल के मैं सुख-दुख की बतियाँ !
ननदी करे अपने भइया को रोचना मन को सकूँ ना सम्हार !
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होकर परायी, नयन नीर भर, पार कर आई निबहुर डगरिया
तूने भी भैया पलट के न देखी कैसी बहन की नगरिया !
काहे को बाबुल सरगवास कीन्हा ,छोड़ी धिया बीच धार !
माँ री, बुला एक बार .... !

2 टिप्‍पणियां:

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब , अपनी एक रचना का लिंक दे रहा हूँ ...
http://satish-saxena.blogspot.com/2008/07/blog-post_27.html
शायद पसंद आये, मैं कवि नहीं हूँ जो मन में आता हूँ लिखता हूँ अतः अशुद्धियों को न देखें ....

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत सच और मार्मिक है आपका लेखन ।कई बार ई-मेल पता ढूँढने की कोशिश की थी नहीं मिला ।
-प्रतिभा सक्सेना.